हरे भरे जंगल, घुमावदार पहाड़ी रास्तों का मीलों सफर, फिर होते हैं नर्मदा मैया के दर्शन

बिलासपुर। मैकल की लहरदार पहाड़ियां, साल, सागौन, बांस व मिश्रित वन के बीच घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए मीलों लंबे सफर के बाद अमरकंटक में होते हैं नर्मदा मैया के दर्शन। इन दिनों श्रावण मास चल रहा है। इस मौके पर कांवरिए नर्मदा मैय्या का जल लेकर इन्हीं जंगल, पहाड़ों से होकर भोरमदेव सहित प्रसिद्ध शिव मंदिरों में पहुंचते हैं।
-मुख्यालय से 130 किलोमीटर लंबे सड़क मार्ग से रतनपुर से बेलगहना, चपोरा, केंदा, केंवची के रास्ते अमरकंटक जाएं, तो रास्ते भर वर्षा ऋतु का लुभावना रूप, लावण्य नजर आता है। आलम यह है कि घाटी के पहले मोड़ पर पहुंचते ही बादल करीब आ जाते हैं। अमरकंटक के पूरे रास्ते पल पल बदलते मौसम का मनोहारी दृश्य सुकून पहुंचाता है।
-अमरकंटक के रास्ते की सबसे बड़ी खासियत है कि यह अचानकमार टाइगर रिजर्व और अमरकंटक बायोस्फियर से होकर जाता है। प्रकृति की अनुपम छंटा यहीं दिखती है। पहाड़ी रास्तों के बीच वन ग्राम, खेत, आम के बगीचे, तो कहीं सीमा विहीन तालाब और पोखर मन को मोह लेते हैं। यदा कदा जंगली जानवर रोड क्रास करते दिखलाई देते हैं।
अमरकंटक: एक नजर में
-समुद्र तल से अमरकंटक 3600 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से तीन नदियां प्रसिद्ध नदियां नर्मदा, सोन और जोहिला निकलती हैं। नर्मदा को गंगा की तरह पवित्र और अहम माना जाता है। पौराणिक कथा के मुताबिक यह भगवान शिव के स्वेद से उत्पन्न हुई है।
-श्रद्धालु श्रावण मास में नर्मदा के दर्शन करने तथा जल चढ़ाने का पुण्य लाभ प्राप्त करने बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। अमरकंटक में सफेद रंग के लगभग 34 मंदिर हैं। यहां नर्मदा का उद्गम कुंड है, यहीं से नर्मदा प्रवाहमान होती है।
-मंदिर परिसर में सूर्य, लक्ष्मी, शिव, गणेश, विष्णु आदि देवी, देवताओं के मंदिर है। मंदिर परिसर में पहुंचते ही तापमान में कमी का अहसास होता है। मंदिरों की स्थापत्य कला अद्भुत है। अमरकंटक साधु संतों की आश्रय स्थली है। प्राचीन काल में यह कई ऋषि, मुनियों की तपोस्थली रही है।
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